‘संवैधानिक नैतिकता’ स्वयं संविधान में निहित है और इसके आवश्यक पहलुओं पर आधारित है। ‘संवैधानिक नैतिकता’ के सिद्धांत को प्रासंगिक न्यायिक निर्णयों की मदद से समझाइए
(UPSC 2021,10 Marks,)
‘Constitutional Morality’ is rooted in the Constitution itself and is founded on its essential facets. Explain the doctrine of ‘Constitutional Morality’ with the help of relevant judicial decisions.
प्रस्तावना
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) संविधान में निहित नैतिक और नैतिक सिद्धांतों को संदर्भित करती है, और यह संवैधानिक ढांचे में निहित मौलिक मूल्यों और आदर्शों पर आधारित है। यह संविधान की व्याख्या और कार्यान्वयन करते समय इन सिद्धांतों को बनाए रखने की प्रतिबद्धता पर जोर देती है।
Explanation
Doctrine of Constitutional Morality: Explained through Relevant Judicial Decisions
1. मार्गदर्शक प्रकाश के रूप में प्रस्तावना
प्रस्तावना संविधान के मूल्यों और आकांक्षाओं को समेटती है।
प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को उजागर करके संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) को प्रतिबिंबित करती है।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) ने संविधान के उद्देश्यों को समझने के लिए प्रस्तावना के महत्व को बरकरार रखा।
2. संविधान की सर्वोच्चता
भारत में, संविधान देश का सर्वोच्च कानून है।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) को बनाए रखना विरोधाभासी हितों पर संविधान को प्राथमिकता देने में शामिल है।
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) ने संविधान को अंतिम प्राधिकरण के रूप में महत्व दिया।
3. मौलिक अधिकारों का संरक्षण
मौलिक अधिकार संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) की आधारशिला हैं।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) राज्य की कार्रवाइयों के खिलाफ व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करती है।
मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार किया, उचित प्रक्रिया और निष्पक्ष प्रक्रिया पर जोर दिया।
4. समान उपचार और भेदभाव न करना
समानता का सिद्धांत संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का आधार है।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) जाति, पंथ या धर्म की परवाह किए बिना सभी व्यक्तियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार की मांग करती है।
केरल राज्य बनाम एन.एम. थॉमस (1976) ने भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति को बरकरार रखा।
5. राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP)
DPSP राज्य को एक न्यायपूर्ण और समान समाज बनाने में मार्गदर्शन करते हैं।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) व्यक्तिगत अधिकारों का सम्मान करते हुए सामाजिक-आर्थिक कल्याण के लिए प्रयास करने में शामिल है।
मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) ने मौलिक अधिकारों और DPSP के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंध पर जोर दिया।
6. न्यायिक समीक्षा और कार्यकारी शक्ति पर नियंत्रण
न्यायिक समीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि सरकार संवैधानिक सीमाओं के भीतर कार्य करे।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) की आवश्यकता है कि सरकारी कार्रवाइयाँ संवैधानिक सीमाओं का पालन करें।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि संविधान की मूल संरचना को बदला नहीं जा सकता।
7. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) में स्वतंत्र रूप से राय व्यक्त करने का अधिकार शामिल है।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) को बनाए रखना असहमति के दृष्टिकोणों के लिए स्थान की सुरक्षा का अर्थ है।
रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को बरकरार रखा।
8. समावेशिता और सामाजिक न्याय
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) समावेशिता और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देती है।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) को बनाए रखना ऐतिहासिक असमानताओं को संबोधित करना शामिल है।
इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) ने ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों के लिए आरक्षण पर जोर दिया।
9. सामाजिक परिवर्तनों के साथ विकसित होना
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) बदलती सामाजिक गतिशीलता के अनुकूल होती है।
यह समकालीन मूल्यों के प्रकाश में संविधान की व्याख्या करने की आवश्यकता है।
नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018) ने समलैंगिकता को अपराधमुक्त किया, जो विकसित नैतिक मानकों को दर्शाता है।
10. लोकतांत्रिक मूल्य और भागीदारी
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) लोकतांत्रिक सिद्धांतों को रेखांकित करती है।
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) को बनाए रखना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और नागरिक भागीदारी को बढ़ावा देना शामिल है।
भारत निर्वाचन आयोग बनाम एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (2002) ने चुनावों में पारदर्शिता के महत्व को उजागर किया।
11. कानून का शासन:
कानून के अधीनता और इसके तहत समान व्यवहार।
शक्ति के मनमाने प्रयोग को रोकना।
उदाहरण: एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) ने आपातकाल के दौरान भी कानून के शासन को बनाए रखने के महत्व को उजागर किया।
निष्कर्ष
संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का सिद्धांत भारतीय संविधान में गहराई से निहित है और इसके आवश्यक सिद्धांतों को दर्शाता है। न्यायिक निर्णयों ने लगातार इस सिद्धांत को बनाए रखने के महत्व को उजागर किया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संविधान के मूल्यों और आकांक्षाओं को व्यवहार में साकार किया जा सके। मौलिक अधिकारों की सुरक्षा, समान उपचार, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक परिवर्तनों के अनुकूलता के संयोजन के माध्यम से, संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) संविधान की व्याख्या और कार्यान्वयन का नैतिक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करती है